बिटकॉइन की माइनिंग में खर्च हो जाती है कई देशों के बराबर बिजली, जानिए कैसे?

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अगर आप किसी क्रिप्टो करेंसी ट्रेडर या इन्वेस्टर से बिटकॉइन के भविष्य के बारे में पूछेंगे तो आपको पॉजिटिव उत्तर मिलेगा। सभी आपको इस समय क्रिप्टो करेंसी में इन्वेस्ट करने की सलाह देंगे क्योंकि आपने वाले समय में डिजिटल करेंसी का ही बोलबाला हो सकता है। लेकिन अगर आप किसी एनवायरनमेंट शुभ चिन्तक से बिटकॉइन के बारे में पूछेंगे तो आपको हो सकता है जरूर मायूसी हाथ लगेगी। ऐसा इस लिए क्योंकि एक बिटकॉइन की माइनिंग में डेनमार्क और आयरलैंड में इस्तेमाल होने वाली बिजली के बराबर बिजली खर्च हो जाती है। चलिए समझते हैं कैसे इतनी बिजली खर्च होती है।

bitcoin mining in hindi

बिटकॉइन के ट्रैन्ज़ैक्शन के अलग अलग स्टेज पर एनर्जी की खपत होती है। इसमें सबसे अधिक बिजली बिटकॉइन माइनिंग में खर्च होती है। दरअसल बिटकॉइन ट्रैन्ज़ैक्शन को मान्य करने के लिए ब्लॉक का जनरेशन होता हैं ब्लॉक में कॉम्प्लेक्स गणित की समीकरण होती हैं जिनको हल करने के लिए आपको हैवी कॉन्फ़िगरेशन वाले कंप्यूटर की जरूरत होती है। अगर आप इन समीकरण को हल करते हैं तो बिटकॉइन का कुछ हिस्सा आपको मिल जाता है। इस प्रोसेस में लगभग 10 मिनट का समय लग जाता है। प्रतिदिन रोजाना इस प्रकार 36 हजार बिटकॉइन का जनरेशन होता है। इस प्रोसेस में बहुत बिजली ख़त्म हो जाती है। इस प्रकार एक रिपोर्ट के अनुसार बिटकॉइन ट्रैन्ज़ैक्शन में 32.71 TWh (terawatt hours) बिजली की खपत होती है जो कि डेनमार्क और आयरलैंड देशों में इस्तेमाल होने वाली बिजली के बराबर है।

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माइनिंग को होना चाहिए कम

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पूरे विश्व में होने वाली माइनिंग का 50 प्रतिशत हिस्सा चीन में किया जाता है। चीन में अधिकतर इलेक्ट्रिकसिटी कोयला आधारित थर्मल प्लांट से उत्पन्न होती है जिससे बहुत मात्रा प्रदूषण होता है। बाकि देशों में भ यही हाल है। बिटकॉइन के अलावा और भी क्रिप्टोकरेंसी मार्किट में उपलब्ध है जो काफी फ़ास्ट हैं और जिनमें बिजली की खपत भी काफी कम होती है।

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